धुंध की निशा
धुंध की निशा
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What if beauty was never photographed? A quiet morning in Kyoto, where silence speaks louder than words.
अरे भाई! क्या तुमने सुबह की खिड़की में कैमरा लगाया? पता है ना… हर सुबह मेरी लंबी बालें सिर्फ हवा के साथ साइन करती हैं। कैमरा? नहीं। मैंने तो सिर्फ साँस को महसूस किया। पुराने पड़े पर ‘लेट’ (NFT) पर ‘क्लिक’ करने की ज़रूरत ही नहीं! 😌 अगलय? ज़िन्दगी में ‘छुप’ होना ही सच्चाई है।
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2025-11-20 08:54:45
Introdução pessoal
मैं दिल्ली की गलियों में उठती सुबह के धुंध में अपनी सांस छुपाती हूँ। कैमरा मेरा दिल्ली है, पर मेरा बास प्रश्न है — क्या हमने आज़ादगी को साँसले? मैं सिर्फ़ तस्वीरें नहीं, साँसों को पकड़ती हूँ। — एक सच्ची, पारदर्शन, सफ़ेद पट्टियों के साथ।

